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खिड़की से टिका आसमान 

खूब निखरा निखरा सा दिन था .चमकदार नीला आसमान,सूरज की सुनहली रौशनी मे नहाया हुआ .कहीं कही इक्का दुक्का सफ़ेद छौने से बादल नीले आकाश मे  अधखुली पलको के सपने से टिके हुए थे .इतराती हवा मे बसंत का नशा था.उसने बालकनी की रेलिंग पर अपनी दोनो कोहनियां टिकाई और  आंखो को आकाश के विस्तार मे खुला छोड़ दिया .धत ,यह तीसरी मंजिल के फ़्लैट से आसमान कितनी दूर लगता है .उसका मन किया बिना रुके एक सांस मे सारी सीढियां चढ कर छत पर पहुंच जाये .छत से आसमान कितना अपना लगता है .पंजो के बल उचक कर खड़े हो और हाथ ऊपर कर बाहों मे भर लो आसमान .नहीं नही वहां हवा भी इतनी तेज लगती है कि बस बाहे फ़ैलाओ और तिरते रहो नीले अनंत विस्तार मे .अरे फ़िर बहकने लगीवह .उसने अपने उड़ते हुए विचारों को पकड़ा और पल्लू के साथ अपने चारों ओर लपेट लिया .विस्तार आकाश का हो ,समुद्र का या फ़िर हरियाली का ,उसे ऐसे ही बहा ले जाता है अपने साथ .और फ़िर बस वह होती  है और उसके आस पास रचा बसा उसकी कल्पना का तिलस्म . उसने अपनी द्रिष्टी को आकाश से समेटा और नीचे पार्क की हरियाली पर छॊड़ दिया .तीसरी मंजिल का यह फ़ायदा तो है कि  पार्क का कुछ हिस्सा  उसे बिल्कुल साफ़ दिखायी देता है और जो दूर है वह धुंधला ही सही पर हरा तो दिखायी पड़ता है .

जाते हुए जाड़े की नरम धूप हरी ,मुलायम घास को अपने गुनगुने स्पर्श से सहला रही थी.पेड़ो के पत्ते हवा की ताल पर धीरे धीरे थिरक रहे थे .दोपहर का अलस सन्नाटा चारों ओर फ़ैला हुआ था.इस समय पार्क अक्सर खाली ही रहता है .जगह जगह लाल नीले पीले उन्नाबी फ़ूल झूम झूम कर बसं त की अगवानी कर रहे थे .उसका मन करता है कि नीचे जा कर नंगे पैर घास पर खूब थिरके और इतनी जोर से हसें की पार्क का सन्नाटा एक मीठी झन्कार से टूट जाये

ऐसी ही नाजाने कितनी भोली भाली नाजुक चाहते उसके मन मे कैद हैं .बारिश की पहली बूंदो को चेहरे पर सीधे मह्सूस करना ,पूरे चांद की रात किसी पहाड़ी पर बैठ सारी सारी रात चांदनी मे डूबे रहना ,डूबते सूरज के रंगो मे नहाये आसमान को साड़ी बना अपने बदन पर लपेट लेना .लेकिन उसे पता है कि ये दुनिया उसके अंदर ही रची बसी है और ऐसी ही रहेगी .कोई नही आयेगा जो उसकी इस सपनीली दुनिया मे सच्चाई का एक भी स्ट्रोक मार दे . नही ऐसा नही है कि वह खूबसूरत नही है .ऐसा भी नही है कि हाथ पैर सलामत नही है .बोल क्या वह तो गा भी बहुत सुरीला लेती है .उम्र भी अभी हाथ से नही निकल गयी .फ़िर भला कोई साथ देने वाला क्यो नही मिल सकता .

 

वह सोचना ही नहीं चाहती उस दिन ,उस घटना के बारे मे .साधारण सी ही थी उसकी दुनिया .चार बहनो के बीच छोटॆ मोटे झगड़े,रूठना ,मनाना.काम मे व्यसत हसती मुस्कुराती मां और उसके पापा.पापा की सबसेे लाडली वही थी.उसके पापा हिन्दी साहित्य के प्रोफ़ेसर थे और उनकी रुचि विरासत मे उसने ही पायी थी .इसीलिये शायद उसका पापा के साथ एक अलग स्तर पर भी जुड़ाव था.उस रात भी वह और पापा एक काव्य गोष्ठी से लौटरहे थे .मां तो बहुत मना करती थी उसे ले जाने के लिये पर फ़िर उसकी लाड़ भरी जिद के आगे घुटने टेक देती थी .उस दिन गोष्ठी बहुत अच्छी रही थी .वह और पापा चर्चा मे व्यस्त चले आरहे थे आटो स्टैंड की तरफ़ .आगे पीछॆ वहां से निकले और लोग भी थे .अचानक पीछे से एक खुली जीप आयी.कुछ लड़के थे .शायद नशे मे थे .जोर जोर से गाते चिल्लाते .जब तक वह समझती  ,हटती या और लोग सतर्क होते उनमे से एक उछल कर बाहर आया और उसे दबोच जीप के अंदर . उसकी घिघ्घीबंध गयी थी .वह चिल्ला भी नही पायी.फ़िर वह कमरा और उन चारो की ग्ड्डंमड्ड होती सूरते .लेकिन उसके जेहन मे अटकी रह गयी थी उसकी शकल जिसने उसे उठाया था .हलां कि उस कमरे मे उसने उसे हाथ भी नही लगाया था ऐसा उसे लगता है .बेहोश होने से पहले एक बार जब उसकी आंख छणांश को खुली थी तो दीवार से चिपके खड़े उसके चेहरे से जा टकरायी थी और फ़िर उसकी आंख खुली थी अस्पताल मे 

मां अंदर आयी थी पापा तो उसके पास ही नही आये थे .मां ने ही बताया था कि वे खुद को ही अपराधी ठहरा रहे थे अंदर ही अंदर .पर ये सब बातें तो बहुत बाद मे उठी थी उसके जेहन मे .ना जाने कितने दिन तो जैसे किसी अंधेरी  सुरंग मे बीत गये .लोगो के बीच तो वह इतने साल बाद भी नही जाती है .आस पास कोई भी हो फ़िर वे चाहे बहने ही क्यो ना हो वह अपने अंदर सिमट जाती है .अरसा हो गये उसकी आवाज निकले .बस जब वह अकेली  होती है ,प्रकृति   के साथ तो जैसे जिंदा हो उठती है .वो .उसके ख्याल और किताबे ...एक अलग संसार रच लिया है उसने अपने चारोंओर .उसे पता है बच्चो वाली किताबे पढते देख ,मां अंदर ही अदर रोती है .अक्सर उससे कहती भी है ....तुम तो मेरी सबसे होशियार बेटी हो .बड़े बड़े कागज दिखाती है ....यह देखो तुम्हारे  सर्टिफ़िकेट ,तुम्हारी डिग्री .पता नही किस लड़की की बात करती है.उसे ऐसी कोई लडकी याद नही आती .अपनी सारी कोशिशे  नाकाम होती देख सबने उसे अब उसके हाल पर छोड दिया है और वह भी इस स्तिथी से खुश है .
आज सबेरे से मां बहुत व्यसत है .छोटी बहन को देखने आने वाले है .मां बिल्कुल नही चाहती थी कि वे लोग घर आये पर वे लोग किसी और काम से शहर मे आये थे इस्लिये उन्हे घर ही बुलाना शिष्टाचार का तकाजा था .बाकी दोनो बहनो की शादी तो मा ने कभी मामा कभी मौसी के शह्रो मे जा कर निप्टायी थी .सच तो यह है कि इस शहर मे कोई जानता भी नही है कि इस घर मे चौथी लड़की भी है .मां उस हादसे के बाद शायद इसीलिये इस बड़े शहर आ गयी थी .यहां वैसे भी किसी को किसी की जिंदगी मे झाकने का समय कहां है.
वह हमेशा की तरह अपने कमरे मे बंद थी .खिड़की की सलाखे पकड़े आकाश ताकती.लड़के की मां कह रही थी ,यह तो शादी करने को तैयार ही नही होता था .पता नही कैसे आपकी बेटी की फ़ोटॊ देख कर आने की हामी भर दी .बस मेरा बेटा हां कर दे ,हम तो तैयार ही है .मां सोच रही थी ,मेरी बेटी जैसी लड़कियां नहीं दिखायी होगी वरना फ़िर इसके लिये क्यो राजी हो जाता .वह एक दो शब्दो मे पूछी गयी बात का जवाब दे देता और फ़िर चुप बैठ जाता .लेकिन वह बहुत प्रयत्नो के बाव्जूद अपनी बेचैनी ,अपनी उद्विग्न्ता छुपा नही पा रहा था .मां को लग रहा था किसी के घर जा कर लड़की देखने मे अक्सर सम्वेदन्शील लड़के असहज अनुभव करने लगते है .
उसके कमरे की बाहर की ओर खुलने वाली खिड़की से बालकनी का एक छोटा सा कोना दिखता है .कौवो की करकश आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ और आस्मान मे चिपकी उसकी नज़र बाल्कनी की ओर मुड़ी .उसकी आंखे फ़टने लगी .कोने मे चिडिया का एक नाजुक सा बच्चा उपर किसी घोसले से आ गिरा था .उसके चारो ओर पांच छः कौवे मंडरा रहे थे ,जोर जोर से शोर मचाते .बच्चा बेचारा दुबक कर फ़र्श से चिपक जाने की कोशिश कर रहा था .अभी उसके पंख पूरी तरह खुले तो क्या उगे भी नहीं थे.खिड़की जाली पर उसकी उगलिओ का दबाव बढता जा रहा था .वह चिल्लाने की कोशिश कर रही थी पर आवाज कही गले के अंदर ही घुट कर रह जा रही थी.तभी एक कौवा दुःसाहस कर आगे बढाऔर चिड़िया के बच्चे के नाजुक सी काया पर अपनी चोंच मारी .उसकी देखा देखी दूसरा भी आगे बढा .उसकी उगंलियो से रक्त की पतली सी धार बही और पलके कस कर बंद हो गयी .दिल दहला देने वाले एक रुधी,घुटी चीख दूर तक फ़ैल गयी .
कमरे मे बैठे सारे लोग चौंक गये .मां कांप उठी .कमरे के दर्वाजे पर छोटी के हाथो मे चाय की ट्रे थर्थरा उठी .बिना आगा पीछा सोचे मां झटके से उठ उसके कमरे की ओर भागे किसी अन्होनी की आशंका मे डूबे मेह्मान भी उठ खड़े हुए लेकिन लड़का जैसे किसी अनजानी डोर से बंधा मां के पीछे पीछे कमरे तक चला गया ,पूरा घर फ़लागता .उसे रोके या कुछ कहे इतनी चेतना कोई बटोर ही नही पाया .वह अभी भी वैसे ही खिड़की से चिपकी थी ,मुंह से दबी दबी चीखे अभी भी निकल रही थी .मां अपनी पूरी कोशिश के बाव्जूद उसकी घयल उगलियो को खिड़की से अलग नही कर पा रही थी .लड़का मा की सहायता करने आगे बढा और उसके चेहरे पर नज़र पड़ते ही जड़ हो गया .उसके चेहरे के भाव इतने मुखर थे कि मां खॆऎ आंखो मे सैकड़ो सवाल एक साथ तैर गये .अपने को संयत कर लड़के ने उसकी उंगलियो पर अपने कंप्कंपा ते हाथ रखे और एक एक कर उसकी उंगलियो को जाली से अलग करने लगा .
उसकी मूर्छा मे जैसे सेंध लगी .खून से लत्पथ अपनी हथेलियो को उसने आश्चार्य से देखा फ़िर जैसे कमरे मे औरो की उपस्थिति के प्रति सजग हुई .उसकी नज़रे उठी और पास खड़े लडके के चेहरे पर ठहर गयी .उसकी द्रिष्टी मे कोई दबी सी चिन्गारी लहकी ,कोई भूली सी पह्चान जागी और वह अचानक हर्कत मे आ गयी .उसके मुंह से अस्फ़ुट शब्द गिरते जारहे थे और वह दोनो हाथो से लड़के की कमीज पकड़ उसे झिंझोड़  रही थी .सब बुत से खड़े थे .कोई कुछ  नही समझ पा रहा था .लड्का चुप्चाप खड़ा उसका यह आक्रमण झेल रहा था .मां को ऐसा लग रहा था कि लड़्के के चहरे पर सूकून की छाया फ़ैलती जारही है.लड़के ने अपनी लटकी हुई बाहे उठायी और धीरे से उसे सहारा दे कुर्सी तक ले आया .उसे बैठा कर खुद वही जमीन पर उसके पैरो के पास बैठ गया .कमरे मे बाकी लोगो की उपस्थिति जैसे बेमानी थी .अब लड़का बोल रहा था साफ़ लफ़्जो और द्रिढ आवाज मे ......तुम्हारी ही तरह मै भी उस रात को कभी भूल नही पाया .मेरे हाथो बहुत बड़ा पाप हुआ है .जोश ,शर्त और पहले नशे के झोक मे मुझसे जो हो गया था वह कुछ इस तरह घटॆगा इसकी मैं कल्पना नही कर पाया था .सच मानो हमने कुछ प्लान नही किया था .सब कैसे घटता चला गया .मैने कितना ढूढने की को शिश भी की .तब्से आज तक एक भी रात ठीक से नही सोया हूं .मेरा पाप नासूर बन मेरे भीतर टीसता रहता है .प्लीज, तुम मुझे इससे मुक्त होने का रास्ता दिखाओ .मै..मै सब कुछ सहने ,सब कुछ करने को तैयार हूं .वह चुपचाप उसकी आंखो मे फ़ैले रेगिस्तन को देख रही थी .फ़िर वह धीरे से कुर्सी से उतर उसके पास बैठी और सीधे उसकी आंखो मे झांका .अचानक दोनो एक दूसरे से लिपटे और एक साथ बहते आंसुओ नेे एक नया भविष्य रचना शुरु कर दिया .अपने अपने आंसू पोछते सब धीरे धीरे कमरे से बाहर हो गये और आस्मान नीचे आ खिड़की से टिक कर खड़ा हो गया .खूब निखरा निखरा सा दिन था .चमकदार नीला आसमान,सूरज की सुनहली रौशनी मे नहाया हुआ .कहीं कही इक्का दुक्का सफ़ेद छौने से बादल नीले आकाश मे  अधखुली पलको के सपने से टिके हुए थे .इतराती हवा मे बसंत का नशा था.उसने बालकनी की रेलिंग पर अपनी दोनो कोहनियां टिकयी और आंखो को आकाश के विस्तार मे खुला छोड़ दिया .धत ,यह तीसरी मंजिल के फ़्लैट से आसमान कितनी दूर लगता है .उसका मन किया बिना रुके एक सांस मे सारी सीढियां चढ कर छत पर पहुंच जाये .छत से आसमान कितना अपना लगता है .पंजो के बल उचक कर खड़े हो और हाथ ऊपर कर बाहों मे भर लो आसमान .नहीं नही वहां हवा भी इतनी तेज लगती है कि बस बाहे फ़ैलाओ
और तिरते रहो नीले अनंत विस्तार मे .अरे फ़िर बहकने लगीवह .उसने अपने उड़ते हुए विचरों को पकड़ा और पल्लू के साथ अपने चारों ओर लपेट लिया .विस्तार आकाश का हो ,समुद्र का या फ़िर हरियाली का ,उसे ऐसे ही बहा ले जाता है अपने साथ .और फ़िर बस वह होति है और उसके आस पास रचा बसा उसकी कल्पना का तिल्स्म .
उसने अपनी द्रिष्टी को आकाश से समेटा और नीचे पार्क की हरियाली पर छॊड़ दिया .तीसरी मंजिल का यह फ़ायदा तो है कि  पार्क का कुछ हिससा उसे बिल्कुल साफ़ दिखायी देता है और जो दूर है वह धुंधला ही सही पर हरा तो दिखायी पड़ता है .जाते हुए जाड़े की नरम धूप हरी ,मुलायम घास को अपने गुनगुने स्पर्श से सहला रही थी.पेड़ो के पत्ते हवा की ताल पर धीरे धीरे थिरक रहे थे .दोपहर का अलस सन्नाटा चारों ओर फ़ैला हुआ था.इस समय पार्क अक्सर खाली ही रहता है .जगह जगह लाल नीले पीले उन्नाबी फ़ूल झूम झूम कर बसं त की अगवानी कर रहे थे .उसका मन करता है कि नीचे जा कर नंगे पैर घास पर खूब थिरके और इतनी जोर से हसें की पार्क का सन्नाटा एक मीठी झन्कार से टूट जाये .
ऐसी ही नाजाने कितनी भोली भाली नाजुक चाहते उसके मन मे कैद हैं .बारिश की पहली बूंदो को चेहरे पर सीधे मह्सूस करना ,पूरे चांद की रात किसी पहाड़ी पर बैठ सारी सारी रात चांदनी मे डूबे रहना ,डूबते सूरज के रंगो मे नहाये आसमान को साड़ी बना अपने बदन पर लपेट लेना .लेकिन उसे पता है कि ये दुनिया उसके अंदर ही रची बसी है और ऐसी ही रहेगी .कोई नही आयेगा जो उसकी इस सपनीली दुनिया मे सच्चाई का एक भी स्ट्रोक मार दे .
नही ऐसा नही है कि वह खूबसूरत नही है .ऐसा भी नही है कि हाथ पैर सलामत नही है .बोल क्या वह तो गा भी बहुत सुरीला लेती है .उम्र भी अभी हाथ से नही निकल गयी .फ़िर भला कोई साथ देने वाला क्यो नही मिल सकता .
वह सोचना ही नहीं चाहती उस दिन ,उस घटना के बारे मे .साधारण सी ही थी उसकी दुनिया .चार बहनो के बीच छोटॆ मोटे झगड़े,रूठना ,मनाना.काम मे व्यसत हसती मुस्कुराती मां और उसके पापा.पापा की सबसेे लाडली वही थी.उसके पापा हिन्दी साहित्य के प्रोफ़ेसर थे और उनकी रुचि विरासत मे उसने ही पायी थी .इसीलिये शायद उसका पापा के साथ एक अलग स्तर पर भी जुड़ाव था.उस रात भी वह और पापा एक काव्य गोष्ठी से लौटरहे थे .मां तो बहुत मना करती थी उसे ले जाने के लिये पर फ़िर उसकी लाड़ भरी जिद के आगे घुटने टेक देती थी .उस दिन गोष्ठी बहुत अच्छी रही थी .वह और पापा चर्चा मे व्यस्त चले आरहे थे आटो स्टैंड की तरफ़ .आगे पीछॆ वहां से निकले और लोग भी थे .अचानक पीछे से एक खुली जीप आयी.कुछ लड़के थे .शायद नशे मे थे .जोर जोर से गाते चिल्लाते .जब तक वह सम्झती ,हटती या और लोग सतर्क होते उनमे से एक उछल कर बाहर आया और उसे दबोच जीप के अंदर . उसकी घिघ्घीबंध गयी थी .वह चिल्ला भी नही पायी.फ़िर वह कमरा और उन चारो की ग्ड्डंमड्ड होती सूरते .लेकिन उसके जेहन मे अटकी रह गयी थी उसकी शकल जिसने उसे उठाया था .हलां कि उस कमरे मे उसने उसे हाथ भी नही लगाया था ऐसा उसे लगता है .बेहोश होने से पहले एक बार जब उसकी आंख छणांश को खुली थी तो दीवार से चिपके खड़े उसके चेहरे से जा टकरायी थी और फ़िर उसकी आंख खुली थी अस्प्ताल मे . 
मां अंदर आयी थी पापा तो उसके पास ही नही आये थे .मां ने ही बताया था कि वे खुद को ही अपराधी ठहरा रहे थे अंदर ही अंदर .पर ये सब बातें तो बहुत बाद मे उठी थी उसके जेहन मे .ना जाने कितने दिन तो जैसे किसि अंधेरी सुरंग मे बीत गये .लोगो के बीच तो वह इतने साल बाद भी नही जाती है .आस पास कोई भी हो फ़िर वे चाहे बहने ही क्यो ना हो वह अपने अंदर सिमट जाती है .अरसा हो गये उसकी आवाज निकले .बस जब वह अकेलि होती है ,प्रक्रिति  के साथ तो जैसे जिंदा हो उठती है .वो .उसके ख्याल और किताबे ...एक अलग संसार रच लिया है उसने अपने चारोंओर .उसे पता है बच्चो वाली किताबे पढते देख ,मां अंदर ही अदर रोती है .अक्सर उससे कहती भी है ....तुम तो मेरी सबसे होशियार बेटी हो .बड़े बड़े कागज दिखाती है ....यह देखो तुमाहरे सर्टिफ़िकेट ,तुम्हारी डिग्री .पता नही किस लड़की की बात करती है.उसे ऐसी कोई लडकी याद नही आती .अपनी सारी कोशिे नाकाम होती देख सबने उसे अब उसके हाल पर छोड दिया है और वह भी इस स्तिथी से खुश है .
आज सबेरे से मां बहुत व्यसत है .छोटी बहन को देखने आने वाले है .मां बिल्कुल नही चाहती थी कि वे लोग घर आये पर वे लोग किसी और काम से शहर मे आये थे इस्लिये उन्हे घर ही बुलाना शिष्टाचार का तकाजा था .बाकी दोनो बहनो की शादी तो मा ने कभी मामा कभी मौसी के शह्रो मे जा कर निप्टायी थी .सच तो यह है कि इस शहर मे कोई जानता भी नही है कि इस घर मे चौथी लड़की भी है .मां उस हादसे के बाद शायद इसीलिये इस बड़े शहर आ गयी थी .यहां वैसे भी किसी को किसी की जिंदगी मे झाकने का समय कहां है.
वह हमेशा की तरह अपने कमरे मे बंद थी .खिड़की की सलाखे पकड़े आकाश ताकती.लड़के की मां कह रही थी ,यह तो शादी करने को तैयार ही नही होता था .पता नही कैसे आपकी बेटी की फ़ोटॊ देख कर आने की हामी भर दी .बस मेरा बेटा हां कर दे ,हम तो तैयार ही है .मां सोच रही थी ,मेरी बेटी जैसी लड़कियां नहीं दिखायी होगी वरना फ़िर इसके लिये क्यो राजी हो जाता .वह एक दो शब्दो मे पूछी गयी बात का जवाब दे देता और फ़िर चुप बैठ जाता .लेकिन वह बहुत प्रयत्नो के बाव्जूद अपनी बेचैनी ,अपनी उद्विग्न्ता छुपा नही पा रहा था .मां को लग रहा था किसी के घर जा कर लड़की देखने मे अक्सर सम्वेदन्शील लड़के असहज अनुभव करने लगते है .
उसके कमरे की बाहर की ओर खुलने वाली खिड़की से बालकनी का एक छोटा सा कोना दिखता है .कौवो की करकश आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ और आस्मान मे चिपकी उसकी नज़र बाल्कनी की ओर मुड़ी .उसकी आंखे फ़टने लगी .कोने मे चिडिया का एक नाजुक सा बच्चा उपर किसी घोसले से आ गिरा था .उसके चारो ओर पांच छः कौवे मंडरा रहे थे ,जोर जोर से शोर मचाते .बच्चा बेचारा दुबक कर फ़र्श से चिपक जाने की कोशिश कर रहा था .अभी उसके पंख पूरी तरह खुले तो क्या उगे भी नहीं थे.खिड़की जाली पर उसकी उगलिओ का दबाव बढता जा रहा था .वह चिल्लाने की कोशिश कर रही थी पर आवाज कही गले के अंदर ही घुट कर रह जा रही थी.तभी एक कौवा दुःसाहस कर आगे बढाऔर चिड़िया के बच्चे के नाजुक सी काया पर अपनी चोंच मारी .उसकी देखा देखी दूसरा भी आगे बढा .उसकी उगंलियो से रक्त की पतली सी धार बही और पलके कस कर बंद हो गयी .दिल दहला देने वाले एक रुधी,घुटी चीख दूर तक फ़ैल गयी .
कमरे मे बैठे सारे लोग चौंक गये .मां कांप उठी .कमरे के दर्वाजे पर छोटी के हाथो मे चाय की ट्रे थर्थरा उठी .बिना आगा पीछा सोचे मां झटके से उठ उसके कमरे की ओर भागे किसी अन्होनी की आशंका मे डूबे मेह्मान भी उठ खड़े हुए लेकिन लड़का जैसे किसी अनजानी डोर से बंधा मां के पीछे पीछे कमरे तक चला गया ,पूरा घर फ़लागता .उसे रोके या कुछ कहे इतनी चेतना कोई बटोर ही नही पाया .वह अभी भी वैसे ही खिड़की से चिपकी थी ,मुंह से दबी दबी चीखे अभी भी निकल रही थी .मां अपनी पूरी कोशिश के बाव्जूद उसकी घयल उगलियो को खिड़की से अलग नही कर पा रही थी .लड़का मा की सहायता करने आगे बढा और उसके चेहरे पर नज़र पड़ते ही जड़ हो गया .उसके चेहरे के भाव इतने मुखर थे कि मां खॆऎ आंखो मे सैकड़ो सवाल एक साथ तैर गये .अपने को संयत कर लड़के ने उसकी उंगलियो पर अपने कंप्कंपा ते हाथ रखे और एक एक कर उसकी उंगलियो को जाली से अलग करने लगा .
उसकी मूर्छा मे जैसे सेंध लगी .खून से लत्पथ अपनी हथेलियो को उसने आश्चार्य से देखा फ़िर जैसे कमरे मे औरो की उपस्थिति के प्रति सजग हुई .उसकी नज़रे उठी और पास खड़े लडके के चेहरे पर ठहर गयी .उसकी द्रिष्टी मे कोई दबी सी चिन्गारी लहकी ,कोई भूली सी पह्चान जागी और वह अचानक हर्कत मे आ गयी .उसके मुंह से अस्फ़ुट शब्द गिरते जारहे थे और वह दोनो हाथो से लड़के की कमीज पकड़ उसे झिंझोड़  रही थी .सब बुत से खड़े थे .कोई कुछ  नही समझ पा रहा था .लड्का चुप्चाप खड़ा उसका यह आक्रमण झेल रहा था .मां को ऐसा लग रहा था कि लड़्के के चहरे पर सूकून की छाया फ़ैलती जारही है.लड़के ने अपनी लटकी हुई बाहे उठायी और धीरे से उसे सहारा दे कुर्सी तक ले आया .उसे बैठा कर खुद वही जमीन पर उसके पैरो के पास बैठ गया .कमरे मे बाकी लोगो की उपस्थिति जैसे बेमानी थी .अब लड़का बोल रहा था साफ़ लफ़्जो और द्रिढ आवाज मे ......तुम्हारी ही तरह मै भी उस रात को कभी भूल नही पाया .मेरे हाथो बहुत बड़ा पाप हुआ है .जोश ,शर्त और पहले नशे के झोक मे मुझसे जो हो गया था वह कुछ इस तरह घटॆगा इसकी मैं कल्पना नही कर पाया था .सच मानो हमने कुछ प्लान नही किया था .सब कैसे घटता चला गया .मैने कितना ढूढने की को शिश भी की .तब्से आज तक एक भी रात ठीक से नही सोया हूं .मेरा पाप नासूर बन मेरे भीतर टीसता रहता है .प्लीज, तुम मुझे इससे मुक्त होने का रास्ता दिखाओ .मै..मै सब कुछ सहने ,सब कुछ करने को तैयार हूं .वह चुपचाप उसकी आंखो मे फ़ैले रेगिस्तन को देख रही थी .फ़िर वह धीरे से कुर्सी से उतर उसके पास बैठी और सीधे उसकी आंखो मे झांका .अचानक दोनो एक दूसरे से लिपटे और एक साथ बहते आंसुओ नेे एक नया भविष्य रचना शुरु कर दिया .अपने अपने आंसू पोछते सब धीरे धीरे कमरे से बाहर हो गये और आस्मान नीचे आ खिड़की से टिक कर खड़ा हो गया .खूब निखरा निखरा सा दिन था .चमकदार नीला आसमान,सूरज की सुनहली रौशनी मे नहाया हुआ .कहीं कही इक्का दुक्का सफ़ेद छौने से बादल नीले आकाश मे  अधखुली पलको के सपने से टिके हुए थे .इतराती हवा मे बसंत का नशा था.उसने बालकनी की रेलिंग पर अपनी दोनो कोहनियां टिकयी और आंखो को आकाश के विस्तार मे खुला छोड़ दिया .धत ,यह तीसरी मंजिल के फ़्लैट से आसमान कितनी दूर लगता है .उसका मन किया बिना रुके एक सांस मे सारी सीढियां चढ कर छत पर पहुंच जाये .छत से आसमान कितना अपना लगता है .पंजो के बल उचक कर खड़े हो और हाथ ऊपर कर बाहों मे भर लो आसमान .नहीं नही वहां हवा भी इतनी तेज लगती है कि बस बाहे फ़ैलाओ और तिरते रहो नीले अनंत विस्तार मे .अरे फ़िर बहकने लगीवह .उसने अपने उड़ते हुए विचरों को पकड़ा और पल्लू के साथ अपने चारों ओर लपेट लिया .विस्तार आकाश का हो ,समुद्र का या फ़िर हरियाली का ,उसे ऐसे ही बहा ले जाता है अपने साथ .और फ़िर बस वह होति है और उसके आस पास रचा बसा उसकी कल्पना का तिल्स्म .
उसने अपनी द्रिष्टी को आकाश से समेटा और नीचे पार्क की हरियाली पर छॊड़ दिया .तीसरी मंजिल का यह फ़ायदा तो है कि  पार्क का कुछ हिससा उसे बिल्कुल साफ़ दिखायी देता है और जो दूर है वह धुंधला ही सही पर हरा तो दिखायी पड़ता है .जाते हुए जाड़े की नरम धूप हरी ,मुलायम घास को अपने गुनगुने स्पर्श से सहला रही थी.पेड़ो के पत्ते हवा की ताल पर धीरे धीरे थिरक रहे थे .दोपहर का अलस सन्नाटा चारों ओर फ़ैला हुआ था.इस समय पार्क अक्सर खाली ही रहता है .जगह जगह लाल नीले पीले उन्नाबी फ़ूल झूम झूम कर बसं त की अगवानी कर रहे थे .उसका मन करता है कि नीचे जा कर नंगे पैर घास पर खूब थिरके और इतनी जोर से हसें की पार्क का सन्नाटा एक मीठी झन्कार से टूट जाये .
ऐसी ही नाजाने कितनी भोली भाली नाजुक चाहते उसके मन मे कैद हैं .बारिश की पहली बूंदो को चेहरे पर सीधे मह्सूस करना ,पूरे चांद की रात किसी पहाड़ी पर बैठ सारी सारी रात चांदनी मे डूबे रहना ,डूबते सूरज के रंगो मे नहाये आसमान को साड़ी बना अपने बदन पर लपेट लेना .लेकिन उसे पता है कि ये दुनिया उसके अंदर ही रची बसी है और ऐसी ही रहेगी .कोई नही आयेगा जो उसकी इस सपनीली दुनिया मे सच्चाई का एक भी स्ट्रोक मार दे .
नही ऐसा नही है कि वह खूबसूरत नही है .ऐसा भी नही है कि हाथ पैर सलामत नही है .बोल क्या वह तो गा भी बहुत सुरीला लेती है .उम्र भी अभी हाथ से नही निकल गयी .फ़िर भला कोई साथ देने वाला क्यो नही मिल सकता .
वह सोचना ही नहीं चाहती उस दिन ,उस घटना के बारे मे .साधारण सी ही थी उसकी दुनिया .चार बहनो के बीच छोटॆ मोटे झगड़े,रूठना ,मनाना.काम मे व्यसत हसती मुस्कुराती मां और उसके पापा.पापा की सबसेे लाडली वही थी.उसके पापा हिन्दी साहित्य के प्रोफ़ेसर थे और उनकी रुचि विरासत मे उसने ही पायी थी .इसीलिये शायद उसका पापा के साथ एक अलग स्तर पर भी जुड़ाव था.उस रात भी वह और पापा एक काव्य गोष्ठी से लौटरहे थे .मां तो बहुत मना करती थी उसे ले जाने के लिये पर फ़िर उसकी लाड़ भरी जिद के आगे घुटने टेक देती थी .उस दिन गोष्ठी बहुत अच्छी रही थी .वह और पापा चर्चा मे व्यस्त चले आरहे थे आटो स्टैंड की तरफ़ .आगे पीछॆ वहां से निकले और लोग भी थे .अचानक पीछे से एक खुली जीप आयी.कुछ लड़के थे .शायद नशे मे थे .जोर जोर से गाते चिल्लाते .जब तक वह सम्झती ,हटती या और लोग सतर्क होते उनमे से एक उछल कर बाहर आया और उसे दबोच जीप के अंदर . उसकी घिघ्घीबंध गयी थी .वह चिल्ला भी नही पायी.फ़िर वह कमरा और उन चारो की ग्ड्डंमड्ड होती सूरते .लेकिन उसके जेहन मे अटकी रह गयी थी उसकी शकल जिसने उसे उठाया था .हलां कि उस कमरे मे उसने उसे हाथ भी नही लगाया था ऐसा उसे लगता है .बेहोश होने से पहले एक बार जब उसकी आंख छणांश को खुली थी तो दीवार से चिपके खड़े उसके चेहरे से जा टकरायी थी और फ़िर उसकी आंख खुली थी अस्प्ताल मे . 
मां अंदर आयी थी पापा तो उसके पास ही नही आये थे .मां ने ही बताया था कि वे खुद को ही अपराधी ठहरा रहे थे अंदर ही अंदर .पर ये सब बातें तो बहुत बाद मे उठी थी उसके जेहन मे .ना जाने कितने दिन तो जैसे किसि अंधेरी सुरंग मे बीत गये .लोगो के बीच तो वह इतने साल बाद भी नही जाती है .आस पास कोई भी हो फ़िर वे चाहे बहने ही क्यो ना हो वह अपने अंदर सिमट जाती है .अरसा हो गये उसकी आवाज निकले .बस जब वह अकेलि होती है ,प्रक्रिति  के साथ तो जैसे जिंदा हो उठती है .वो .उसके ख्याल और किताबे ...एक अलग संसार रच लिया है उसने अपने चारोंओर .उसे पता है बच्चो वाली किताबे पढते देख ,मां अंदर ही अदर रोती है .अक्सर उससे कहती भी है ....तुम तो मेरी सबसे होशियार बेटी हो .बड़े बड़े कागज दिखाती है ....यह देखो तुमाहरे सर्टिफ़िकेट ,तुम्हारी डिग्री .पता नही किस लड़की की बात करती है.उसे ऐसी कोई लडकी याद नही आती .अपनी सारी कोशिे नाकाम होती देख सबने उसे अब उसके हाल पर छोड दिया है और वह भी इस स्तिथी से खुश है .
आज सबेरे से मां बहुत व्यस्त  है .छोटी बहन को देखने आने वाले है .मां बिल्कुल नही चाहती थी कि वे लोग घर आये पर वे लोग किसी और काम से शहर मे आये थे इसलिए  उन्हे घर ही बुलाना शिष्टाचार का तकाजा था .बाकी दोनो बहनो की शादी तो मा ने कभी मामा कभी मौसी के शहरों मे जा कर निपटाई  थी .सच तो यह है कि इस शहर मे कोई जानता भी नही है कि इस घर मे चौथी लड़की भी है .मां उस हादसे के बाद शायद इसीलिये इस बड़े शहर आ गयी थी .यहां वैसे भी किसी को किसी की जिंदगी मे झाकने का समय कहां है.
वह हमेशा की तरह अपने कमरे मे बंद थी .खिड़की की सलाखे पकड़े आकाश ताकती.लड़के की मां कह रही थी ,यह तो शादी करने को तैयार ही नही होता था .पता नही कैसे आपकी बेटी की फ़ोटॊ देख कर आने की हामी भर दी .बस मेरा बेटा हां कर दे ,हम तो तैयार ही है .मां सोच रही थी ,मेरी बेटी जैसी लड़कियां नहीं दिखायी होगी वरना फ़िर इसके लिये क्यो राजी हो जाता .वह एक दो शब्दो मे पूछी गयी बात का जवाब दे देता और फ़िर चुप बैठ जाता .लेकिन वह बहुत प्रयत्नों  के बावजूद  अपनी बेचैनी ,अपनी उद्विग्न्ता छुपा नही पा रहा था .मां को लग रहा था किसी के घर जा कर लड़की देखने मे अक्सर सम्वेदन्शील लड़के असहज अनुभव करने लगते है .
उसके कमरे की बाहर की ओर खुलने वाली खिड़की से बालकनी का एक छोटा सा कोना दिखता है .कौवो की कर्कश  आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ और आसमान से  चिपकी उसकी नज़र बालकनी  की ओर मुड़ी .उसकी आंखे फ़टने लगी .कोने मे चिडिया का एक नाजुक सा बच्चा उपर किसी घोसले से आ गिरा था .उसके चारो ओर पांच छः कौवे मंडरा रहे थे ,जोर जोर से शोर मचाते .बच्चा बेचारा दुबक कर फ़र्श से चिपक जाने की कोशिश कर रहा था .अभी उसके पंख पूरी तरह खुले तो क्या उगे भी नहीं थे.खिड़की की  जाली पर उसकी उगलिओ का दबाव बढता जा रहा था .वह चिल्लाने की कोशिश कर रही थी पर आवाज कही गले के अंदर ही घुट कर रह जा रही थी.तभी एक कौवा दुःसाहस कर आगे बढाऔर चिड़िया के बच्चे के नाजुक सी काया पर अपनी चोंच मारी .उसकी देखा देखी दूसरा भी आगे बढा .उसकी उगंलियो से रक्त की पतली सी धार बही और पलके कस कर बंद हो गयी .दिल दहला देने वाले एक रुधी,घुटी चीख दूर तक फ़ैल गयी .
कमरे मे बैठे सारे लोग चौंक गये .मां कांप उठी .कमरे के दरवाज़े पर छोटी के हाथो मे चाय की ट्रे थरथरा उठी .बिना आगा पीछा सोचे मां झटके से उठ उसके कमरे की ओर भागी  किसी अनहोनी  की आशंका मे डूबे मेह्मान भी उठ खड़े हुए लेकिन लड़का जैसे किसी अनजानी डोर से बंधा मां के पीछे पीछे कमरे तक चला गया ,पूरा घर फ़लागता .उसे रोके या कुछ कहे इतनी चेतना कोई बटोर ही नही पाया .वह अभी भी वैसे ही खिड़की से चिपकी थी ,मुंह से दबी दबी चीखे अभी भी निकल रही थी .मां अपनी पूरी कोशिश के बावजूद  उसकी घायल  उगलियो को खिड़की से अलग नही कर पा रही थी .लड़का मा की सहायता करने आगे बढा और उसके चेहरे पर नज़र पड़ते ही जड़ हो गया .उसके चेहरे के भाव इतने मुखर थे कि मां की आंखो मे सैकड़ो सवाल एक साथ तैर गये .अपने को संयत कर लड़के ने उसकी उंगलियो पर अपने कपकपाते हाथ  रखे और एक एक कर उसकी उंगलियो को जाली से अलग करने लगा .
उसकी मूर्छा मे जैसे सेंध लगी .खून से लतपथ  अपनी हथेलियो को उसने आश्चार्य से देखा फ़िर जैसे कमरे मे औरो की उपस्थिति के प्रति सजग हुई .उसकी नज़रे उठी और पास खड़े लडके के चेहरे पर ठहर गयी .उसकी द्रिष्टी मे कोई दबी सी चिन्गारी लहकी ,कोई भूली सी पह्चान जागी और वह अचानक हरकत  मे आ गयी .उसके मुंह से अस्फ़ुट शब्द गिरते जारहे थे और वह दोनो हाथो से लड़के की कमीज पकड़ उसे झिंझोड़  रही थी .सब बुत से खड़े थे .कोई कुछ  नही समझ पा रहा था .लडका चुपचाप  खड़ा उसका यह आक्रमण झेल रहा था .मां को ऐसा लग रहा था कि लड़्के के चहरे पर सूकून की छाया फ़ैलती जा रही है.लड़के ने अपनी लटकी हुई बाहे उठायी और धीरे से उसे सहारा दे कुर्सी तक ले आया .उसे बैठा कर खुद वही जमीन पर उसके पैरो के पास बैठ गया .कमरे मे बाकी लोगो की उपस्थिति जैसे बेमानी थी .अब लड़का बोल रहा था साफ़ लफ़्जो और द्रिढ आवाज मे ......तुम्हारी ही तरह मै भी उस रात को कभी भूल नही पाया .मेरे हाथो बहुत बड़ा पाप हुआ है .जोश ,शर्त और पहले नशे के झोक मे मुझसे जो हो गया था वह कुछ इस तरह घटॆगा इसकी मैं कल्पना नही कर पाया था .सच मानो हमने कुछ प्लान नही किया था .सब कैसे घटता चला गया .मैने कितना ढूढने की   कोशिश  की .तब से  आज तक एक भी रात ठीक से नही सोया हूं .मेरा पाप नासूर बन मेरे भीतर टीसता रहता है .प्लीज, तुम मुझे इससे मुक्त होने का रास्ता दिखाओ .मै..मै सब कुछ सहने ,सब कुछ करने को तैयार हूं .वह चुपचाप उसकी आंखो मे फ़ैले रेगिस्तन को देख रही थी .फ़िर वह धीरे से कुर्सी से उतर उसके पास बैठी और सीधे उसकी आंखो मे झांका .अचानक दोनो एक दूसरे से लिपटे और एक साथ बहते आंसुओ नेे एक नया भविष्य रचना शुरु कर दिया .अपने अपने आंसू पोछते सब धीरे धीरे कमरे से बाहर हो गये और आसमान नीचे आ खिड़की से टिक कर खड़ा हो गया .

Contributing Story Teller: Namita Sachin namitasachan9@gmail.com

नमिता सचान  किताबे पढ़ना ,जो भी मन को छू जाय उसे शब्दों में ढालना और यात्राये करना मेरा शौक है .जीवन जो भी देता है उसे स्वीकारना मेरा जीने का तरीका .राष्ट्रीयकृत बैंक में २० वर्षो तक काम किया और अब सेवा निवर्त हो कर बस

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