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Woh Ek Tara
रात की
उज्जवल चांदनी में मैं देख रही थी सपना,
तारो के समूह में मैं खोज रही हूँ कोई
अपना, धुंद रहे थे चंचल नयन उस
अद्भुत तारे को, जिसकी है
अलौकिक कामना दिन रात मेरे दिल को,
मुस्कान बिखेरते एक तारा जब मेरे सामने आया,
पल पल मेरे हिरदय को उसने अपने लिए
ललचाया, हंसकर बोला धुंद रही
हो किसको इस बाज़ार में,
खोज रही हो किसको इस अम्बर के संसार
में, मैं बोली मैं खोज रही हूँ
उस अपने तारे को, जिसकी है
अलौकिक कामना दिन रात मेरे दिल को,
अधखिले होठों पर खिलाती हुई मुस्कान से,
देख कर मुझको बोला एक नए अंदाज़ में,
कोई नहीं है अपना इस स्वार्थी संसार में,
सब हो गए है पराये बांध गए है अपने
आप में, नयी दुनिया का निर्माण
हो रहा है आज,
धोखा बन गया है जिसका आधार,
आशाओं पर निराशाओं का राज्य बन गया है,
अपना तो कोई नहीं पर हर कोई पराया हो
गया है, सूरज ने जब डाला विषम
जाल अपना,
खुल गए अदर नयन साकार न हुआ वो सपना,
बिखर गया वोह सपना, छुट गए वोह तारे,
दूर हो गए मुझसे पल भर में ही वोह
सरे, समझ गयी मैं क्या होता है
अपना पराया,
अनजान थी इन बातो से जो उस एक तारे
ने समझाया.
Contributed By : Nisha Chandratrey is business women and loves to
write poems on different topics.
nishatpune@gmail.com
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