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हमारी बोलियां

इस डाली से उस डाली

कूंक रही थी कोयल काली

मधुर गीत था सुना रहा

गुंजन करता भंवरा फूल पर

तभी चहकती आईं चिड़ियां

बाग-बगीचों मुंडेरों पर

देख उन्हें कबूतर ने भी

लगा दी अपनी गुटरूं गूं

पंख फैला फिर उड़ा बाज

चीं-चीं करता नील गगन में

टें-टें-टें-टें तोता आया

बैठ पेड़ पर अमरूद खाया

कौवे जी कब चुप रहने वाले

कांव-कांव करते बोले

कर्कश भले है बोली मेरी

लेकिन इसको सब पहचानें ।

Contributed By :  अमृता गोस्वामी जयपुर राजस्थान Freelance writer especially write articles/stories/poems related to kids. amrita_delhi@rediffmail.com

   

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