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Ghazals
मुहब्बत की थी तो निभाई तो होती
कोई प्यार की ज्योति जलाई तो होती
भूले से गर खता हो गई थी हमसे
कभी आकर तुमने बताई तो होती
औरों को वफा की सीख देने वाले
ये सीख खुद तूने अपनाई तो होती
वफा का बेवफाई से क्यूं दिया सिला
कमियाँ क्या थी गिनाईं तो होती
'अनुज' मुझ पे लिख डाली किताब तूने
कोई ग़ज़ल खुद पे बनाई तो होती
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आदत हो गई है सबकी, जुबान से फिरना आजकल
हो गया है इक शौक, मुहब्बत करना आजकल
दिल हर रोज जाने कितने चेहरों पे मरता है
हो गया है किस कदर आसान मरना आजकल
जिस्म तक ही महदूद क्यों हो गई हर नज़र
क्यों नहीं चाहता कोई दिल में उतरना आजकल
मशहूर होने के लिए ये कैसा दीवानापन है
करते हैं पसन्द नज़रों से भी गिरना आजकल
आँख बंद करके यकीं कर लेते हो सब पर तुम
है बेवकूफी 'अनुज' ऐसा कुछ करना आजकल
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आँखों में बसा लीजे
पलकों पे बिठा लीजे
सुर्खी बनाकर मुझको
होठों पे लगा लीजे
फूल बनाकर मुझको
बालों में सजा लीजे
चुनरी बनाकर मुझको
सीने से लगा लीजे
कँगना बनाकर मुझको
हाथों में सजा लीजे
बिंदिया बनाकर मुझको
माथे पर लगा लीजे
सिंदूर बनाकर मुझको
मांग में सजा लीजे
कुछ भी बना लीजे पर
मुझको अपना बना लीजे।
Contributing Poet
Dr.Anuj Narwal Rohtaki ----INDIA
E-Mail-
dr.anujnarwalrohtaki@gmail.com
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