|
|
|
Ghazal Aur Nazam
ख्वाजा मेरे ख्वाजा
एक दरश दिखाजा
खाली हाथ तेरे दर पे आया हूं
साथ अपने कुछ नहीं लाया हूं
तुमको कुछ दूं, औकात नहीं है
मुझमें तुम-सी बात नहीं है
जिंदगी की बेरुखी का
मारा हूं मैं मुफलिसी का
दुनियादारी भी देख ली है
रिश्तेदारी भी देख ली है
काबिल नहीं ये मुहब्बत के
यार हैं ये सब दौलत के
आखिरी दर तेरा बचा है
सबको यहां से खूब मिला है
खाली झोली यहां आते हैं सब
और सब कुछ ले जाते हैं सब
मेरे बिगड़े नशीब बना दो
मोजजा ये आज दिखा दो
मुझपे भी इनायत कर दे
दूर मेरी शिकायत कर दे
खाली झौली को तू भर दे
पूरी मिरी आरज़ू कर दे
मेरी न सुनेगा तो जां दे दूगां
अभी और यहां दे दूगां
क्या सोच रहे हो ख्वाजा जी
हमें दरश दिखा दो खवाजा जी
====
२
हुस्न तेरा इक जलता दरिया
इश्क मेरा है पिंघलता दरिया
रूह बदन मिल जाएं दोनों के
दिल बन जाएगा मचलता दरिया
टूटेंगी अगर ये रस्मों की दीवारें
इश्क बन जाएगा चलता दरिया
मत हो खफा तू मेरी वफा से
हिलने दे वफा का हिलता दरिया
बिन हर्फों के 'अनुज' कैसे लिक्खे
रूका है ग़ज़ल का चलता दरिया।।
ईमेल :
dr.anujnarwalrohtaki@gmail.com |
|
|
|
|